सेक्स करते हुए भजपुर

चण्डयाज--पह हमें नहीं साछूम ।
भाजाद--अछारक्खी को देखो दो पहचान लो या न पहचानो ?
ज७२ आज़ाद-कथा
चंडूबाज़--फोरन पहचान ले । न पहंचानना कैसा ?
मिर्या चंडूबाज तो पीचक छेने ऊूगे | इधर <अंव्बासी श्राजूद मिरजा
के पास श्राई श्लोर कहा-अगर चलनां है तो चले चलिए, वरना फ़िर
आने-जाने का जिकं न की जिएया | आपके टालमटोऊ से वह यहतव चिढ
गई हैं। कहती हैं, थाना हो तो श्राएँ ओर न ना हो तोच आएँ।
यद्द टालमटोंल क्‍यों करते हैं ? * है
व्यजाद ने कहा-मैं देपार बैठा हूँ । चलिए ।
यह 'कहरूर आजाद ने गाड्डी 'संगवाई अर अब्यासी के साथ
अन्दर बैठे। चंडूबाज कोचबकस पर बैठे । गाड़ी रवाना छुई। सुरेया-
बेगम के महक पर गाड़ी पहुँची तो अब्बासी ने अन्दर जाकर कहा--
५३
मुबारक, हुज्ूर भ्रा गए ।
' बेगम--शुक्र है !
'श्रद्या पी-- अब हुजूर, चित्र की भाड़ बैठ जायज -
' चैगम--अच्छा, छुलांओ | कर
“भ्राज्ञादे बरामरें में चिक के पास बैठे । अबव्यासी ने कमरे के बाहर
आांकर कहा-बेगमराहब फ़रमाती है कि हमारे सिर से दुद है, श्राप
तशरीफ़ ले जाइए । ॥॒ ः
धाजाद-बेगमसाइब से कह दीजिए, कि मेरे पास सिर के दर्द का
एक सांयाब जुसेख़ा है ; जा
पठमासी-बह फ़रमादी हैं कि ऐसे-ऐसे मदारी इमने बहुत चगे
किए है ।
आज़ोद--ओऔर अपने सिर'के दर्द का इछाज नहीं हो सकता
बेगम -झआपकी बातों से सिर का दर्द छोर बढता है। खुदा के लिए
शाए मुझे इस चक्त सारामर करने दीजिए । ;
आज़ाद-क्रधा जज
शरज़ाद--
हम ऐसे हो गए अल्लाइ-अकवर ऐ तेरी कुदरत,
हमारा नाम सुनकर दवाथ वह फानों प' धरते हैं ।
या तो बह मज़े-म्त्ते की बातें थीं, भौर सब यह बेवफाई
बेगम--तो यह फद्विए, कि श्याप हमारे पुराने जाननेवालों में हैं !
हिए, मिज्ञाज तो अच्छे के १
श्राज़ादु-दूर से मिन्नाजएर्सी भर्ती नहीं माझूम होती ।
वेगम-शआाप सो पहेलियाँ बुझयाते हैं।ऐ भब्याती, यह किस
लगनप्री को सामने छाकर बिठा दिया ? चाह-वाह !
अब्वाप्ती--( सुसकिराकुर ) हुज्गर, जबरदस्ती चंस पढ़े ।
वेगम--मुहज्लेबालों को इत्तिछा दो ।
श्राज़ाद--धाने पर रपट लिसवा दो और सुश्ऊ बैंधवा दो। .
यह कइकर थभ्ाज्ाद ने श्रलारक्खी को तसवीर अद्यरासी को दी
और कहा-इसे इमारी तरफ से पेश कर दो । अब्शसी ने जाकर बेगम-
साहब को बह तसवीर दी । बेगभस्ताहव तप्तवीर देखते ही दप हो राई ।
ऐं, इन्हें यह तप्वीर कईाँ मिल्ली शायद यह चल्तवीर डिपाफर ले गर
थे । पूछा--इस तसवीर की क्या कोमत है ? ः
माज़ाद--यह विक्काऊ नहीं छह ! '
वेगम-तो फिर दिखाई क्यों ९
आाज़ादु-इसकी कीमत देनेवाका कौई नजर नहीं आता ।'
वेगस--कुछ कहिए तो, किस काम की तसवीर है | '
आज़ाद--हुलूर मिक्ता ले । पुर शाहज़ादे इस तंसवीर के दो छाख
रुपए देतेथे। ४. -।४ ;
वेगभ-यह्द चसवीर आपको मिली कहाँ ? .«
जजड आज्ञाद-कथपा
भाज़ाद- जिसकी यह तसचीर है उससे दिल मिल गया है।
वेगस--ज़री मुंह धो आइए । ॥
इस फिफरे पर अ्यासी कुछ चॉडी, बेगम साहव से कट्टा--जरी
हुज़ूर, सुझे तो दें। मगर वेगम ने सन्दूकचा खोलकर तध्षवीर रख दी।
आज़ादुू-इस शहर की अच्छी रस्म है । देखने को चीज़ ली शोर
हजम ! वीक्रत्वासी, हमारी तप्तचीर छा दो ।
वेगम--लछाखो इुद्टरतें है, हजारों शिकायतें ।
श्राज़ादू- झिससे ?
कुदूरत उनको है. मुझसे नहीं है सामना जब तक;
हधर आँखें मिलीं उनसे उघर दिल मिल गया दिल से ।
बेगम--अजी, होश की दवा करो।'
आज़ाद--8म तो इस ज़ब्त के कायल हैं । हे
चेगम- (हँसकर) वजा । ग
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आज़ाद-अब तो खिलखिलाकर हँस दीं । खुदा के लिए, शव
हस चिक के बाहर आझ्ोया सुझो को अन्दर बुलाश्रो । नकाब और
घूँघट का तिलस्म तोड़ो । दिल वेकादू है।
बेगस--अरव्बासी, इनसे कहो कि अब हमें सोने दें । करू किसी की
राह देखते-देखते रात आँखों में कट गई ।
झाज़ाद--दिव का मौका न था, रात को मेंह बरपघने रूया ।
बैगम- बच, बैठे रहो ।
यह अबस कहते हो, मौका न था और घात न थी ;
मेंहदी पॉवों मे न थी आपके, घरसात न थी।
कजअदाई के सिवा और कोई बात न थी;
आज़ाद-ऊथा ७७५
दिन को आ सकते न थे आप तो क्‍्यारातन थी?
बस, यद्दी कहिए कि मंजूर मुलाकात न थी ।
आजादु--
माशुकपतन नहीं 'प्रगर इतनी कजी न ही !
अव्यासी दंग थी कि या खुदा, यह पया माजरा है । बेगमसाहव
तो जामे से वादर ही हुई जाती हैं । मर सियाँ दाँतों श्रेंगुलियाँ दृधा रही
थीं। इनको हुआ क्या है । दारोगाश्षाहव कटे जाते थे, सगर चुप
वेगम-कोई भी दुनिया में किसी का हुआ ऐ ? सबको देस लिया ।
सढ़पा-वड़पाकर मार ठाला । खेर इमारा भी छुदा है ।
झाजाद--पिछली यातों को अब भूल जाइए ।
वेगम-बेमुरीवर्तों को किसी के दुर्द का हाल क्‍या साछूम ? नहीं तो
क्या वादा करके म्लुकर जाते ।
झाजाद---नालिश भी तो दाग़ दी आपने !
बेगम--इन्तजार करते-करते नाक सें दम भा गया ।
राह उनकी तकते-तकते यह मुद्दत गुज्षर गई ;
आँखो को हौसला न रहा इंतजार का।
आज़ाद, बच्त दिछ ही जानता है। ठान ली थी, कि जिस तरह मु्े
जलाया है, उसी तरह तरसाऊँगी | इस वक्त कलेजा दाँसों उछछ रहा है ।
मगर बेचैनी श्र भी बढुती जाती है । अब डघर का हाल तो कहो,
गये थे !
आज़ादु-बहाँ का -हाल न पुछो । दिऊ पाश-पाश हुआ जाता है ।

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