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घे। धफ़सर से बोले-यह »ैतांन का काम है, खुदा की कसम ।
झफ़सर - उध्की गोशमाली की जावगी ।
शाज़ाद--वह इसी रायक है। मिल जाय तो चचा ही बनाकर छोहट !
खैर, एक बार एक दफ्तर में आप क्लक हो गये । एक दिन आपको
द्व्लयो चूकी, सव अमलछों के जूते उठाकर दरिया में फेंक दिए । सरिश्ते-
दार उठे, इधर-उधर जूता हू ते हैं, कहीं पता ही नहीं,। नाज़िर उठे, जूता
नदारद । पेशकार फो साहब ने घुलाया, देखते हैं तो जूता गायब ।
पेशकार--धरे भाई, कोई साहब जूता ही जड़ा ले गये ।
चपरासी --हुजूर, मेरा जूता पहन लें।
पेशकार--वाह, अच्छा छाछा विशुनद्याल, ज़रा अपना बूट तो
जत्तार दो ।
, ' छाछा घिशुनद्यारू पटवारी थे । इनका लक्कडतोड़ जूता पहनकर
पेशकार साहब बड़े साहब के इजऊास पर गये ।
साहब-चेल-चेल पेशकार, आज बढ़ा अमीर हो गया । बहुत बडा
कीमती छूट पहना है ।
पेशकार--हुजूर, फोई साहब जूता उड़ा ले गये । दफुतर , में ,किसी
का जता नहीं बचा ।_* ह
बड़े साहब तो सुप्रकिराकर चुप हो गये,मयर छोटे साहब बड़े विब्लगी-
बाज़ भादमी थे । इजछाध्व से उठकर दफ़्तर में गये तो देखते हैं कि कृह-
४7०... कह्दे पर कहकठा पड़ रहा है । सब लोग अपने-अपने जूते तलाश रहे हैं।
8८८
ध्,
आजाद कथा ४६५
छोटे साइब ने कटा इस इस आदमी को इनाम छैना चाहते है शिसने
यह कास डिया। जिध दिन इसारा जूथा गायब कर दे, एम उसको
इनाम दे । हे
आ्राजाद--भोर अगर धमारा जूता ग़ायत्र कर दे तो दम परे महीने की
तनप्याह दे दें
एक बार सिरया आज़ाद एक हिन्द के चहाँ गये। वह दुध वक्त रोटी
पका रहे थे। आपने चुपके से जूता उतारा और रपोई सें जा बैठे, ठाकुर
ने ढाटकर कद्दा- पं, यह क्‍या शरारत ! हे “
श्राज़ाद - कुछ नधों, इसने कहा, टेखें, कप तद॒यीर से रोटी
पकाने हो ?
ठाकुर--रसोई ज़ूडी कर दी ! 5
भाजाद-भई, बड़ा अ्रफ़रोस हुआ । दम यह स्या जानते-थे । श्रथ
बह खाना ब्रेकार ज्ञायगा ! ; |
वाकुर-नहों जी, कोई मुप्र॒क॒प्ताम खा ठेगा | |
आजाद--तो हमले उठकर और कौन हे ।
आजाद विस्मित्छाह बहकर थाली में दाथ दालने को थे कि ठद्टर ने
ललफारा-हैं-हैं, रसोई , तो जूडी कर चुफ्रे, झूब क्या बर्तनों पर भी
दाँत है? मु
सैर, श्राज़ाद ने पत्तों में खाना खाया ओर दुआ दी कि खुदा करे
सा एक उल्छू रोज फँस जाये । -
डोम-घारी, तवलिण गवेए, कलाबैंच, ऊथर्,- कोई ऐसा -म था
जैससे मिरजा ब्राज़ाद से सुहाराव न हो | पुक जार एक बीसकार को दो
री हपए इनाम दिए | तब से उस गिरोह में इनकी घाक बैठ गई थी।
के बार आप पुछीस के इस्पेक्टर के साथ जाते थे । दोनों थ॑ डॉ,पर छबार
श्‌ ॒
5६६ आज्ञाद-कथा
थे। भाज़ाद का घोड़ा दर्स था, ओर इनसे बिना सज़ाक के रहा न जाया
चाहे। घुसे से उतर पड़े । घोड़ा हिनद्विनाता हुआ इंस्पेक्टरसाइव के
घोड़े की तरफ चला । उन्‍्हेंने छाख सेभाला लेकितव गिर ही पड़े। पो् में
बड़ी चोट आई ।
धाब सुनिए, चुद्धिय भोर अ्रच्याती जब बेगमक्षाहत्र के यहाँ
पहुँचों तो चेगम का कलेजा घड़कने छगा । फोरन्‌ कमरे के जन्दर चलो
गईं । चुढ़िया ने जाकर पूछा-हुज्ूर, कहाँ त्शरीफ़ रखती हैं।
वेगम-भब्श पी, कहो क्या खबरें हैं !
अ्व्यासी--हुूर के अकाल से सब मामला चोंकप है ।
वेगम--भाते हैं या नहीं ? बध्च, इतना बता दो ।
अब्बासी -हुजू २, धान तो उनके यहाँ एक मेदमान भा गये, मयर
कछ जरूप आववेंगे ।
इतने में एक सहरो ने आकर कट्ठा-दारोयासाहब झये हैं।
बेगम --आा गये ! जीते आपे, बडी बात !
दुरोगा--हाँ हुजूर, श्रापकी छुश्ा से ज्ञीता आया । नहीं तो बचने
" की तो कोई छूरत ही न थी ।
बेगम -जैर, यह बतलाओो, कड्ढीं पत्रा छगा
दारोग।-हुजूर के नमक को कृप्तम कि शहर का कोई मुकाम न
छोड़ा । द
बेगम -भोर कट्दी पता न चला ! है न !
दारोगा-कोई कूचा, कोई गली ऐसी नहीं जहाँ तकाश व की हो
बवेगस--अच्छा, नतीजा क्या हुँ्ना बिले या व मिले ?
दारोगा--हुजूर, सुना कि रेंछ पर सवार होकर कहां बाहर जाते हैं ।
०५. फौरन गाडी किराए की और स्टेशन पर जा पहुँचा, मिर्या आजाद से
झाज़ाद-कथा जद
बार चाँखें हुईं कि हतने में सीटी फूड़ी भौर रेल सट्टसड़ाती हुई चली ।
[मं छपका कि दो-दो दातें फर हू मगर एक पमेगरेज ने हाथ पकड़ छिया।
!. चैगम--पयह सभ सच कहते हो न 3
दारोगा-कूठ कोई छोर बोला करते होंगे।
7 बेयम-सुबह से कुछ खाया तो मे होगा
:.. दारोगा-अ्गर एक घूंट पानी के सिया छुछ भौर खाया ही तो
ह_प्तम ले लीमिए ।
भब्बात्ती-हुजुह, एम एक बात बताएँ तो इनकी शेली ध्रसी-धन्मी
मेकल जाए। कहारों को यहीं घुलाकर प्रउना शुरू कीजिए ।
वेंगमत्ताहव को यह्ट सछाह पसंद भाई । एफ कहार को बुलाकर
7 हिक़ीकात करने लगीं -..
अब्यबासी -बचा, कृढठ बोले तो निकाल दिए जाभोगे ।
कहार--हुजूर, इमें जो सिखाया है, वह कहे देते है । ल्‍
भ्द्याप्ती--या कुछ सिखाया भी है !
के... अंदार--सुत्रद से शव तक सिखाया ही किए या कुछ शरीर किया
प्रहाँ से अपनी पघसुराल गए । वहाँ किसी ने खाने को भी न पएछा सो
इैहाँ से एक सशलिस में गएु। हिस्से लिए भौर चखकर बोले --कहीं
;पेती जगह चली जहाँ किसी की नियाह् न पढ़े। हम छोयों ने नाके के
शहर एक तकिए से मियाना उतारा। दारोगाजी से चहाँ नानवाई की
[कान से साछन और रोटी सगाकर खाईं। इस छोयों को चदचैने के
न हेये पैसे दिए । दिन-भर छोया किए। शास को हुक्म दिया, चलो ।
अष्यासी--दारोगासाहब, सलाम ! श्रजी, इधर देफ़िए दारोगा-
है हित ! ५
; वेगम--क्बों लाहब, यह भूड ! रेल पर गए थे आप ? बोलिए !
जद श्राज़ाद-कथा
दारोग़ा--हुजूर, यह नमऋद्दराम है, क्या अज्ञ करू !

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